बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
Kya Qiyamat ke Din insan Apne Rahnuma ke Pichhe Hoga? यह एक ऐसा सवाल है जिससे मुतल्लिक़ हमें गहराई से सोचना चाहिए कि हम दुनियां में किसकी रहनुमाई में चल रहे हैं? दुनिया की ज़िंदगी में इंसान अकेला नहीं चलता। वह किसी न किसी को अपना रहनुमा बनाता है, किसी की बात सुनता है, किसी के विचारों से मुतास्सिर होता है और फिर उसी के बताए हुए रास्ते पर चलने लगता है। कोई दीन की सही राह दिखाता है, कोई दुनिया की कामयाबी का रास्ता बताता है और कोई ऐसा भी होता है जो लोगों को हक़ से दूर करके गुमराही की तरफ ले जाता है।
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| Qayamat ke din insaan apni duniya ki rehnumai aur pairvi ka anjaam dekhega. |
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिसकी हम दुनिया में पैरवी कर रहे हैं, क़यामत के दिन भी क्या हम उसी के पीछे होंगे?
इस आर्टिकल kya Qiyamat ke Din insan Apne Rahnuma ke Pichhe Hoga? में हम क़ुरआन मजीद की एक बेहद सबक़आमोज़ आयत से मुतल्लिक़ पढ़ेंगे जिसका मंज़र हमें सोचने पर मजबूर कर देने वाला है।
क़ुरआन की दिल हिला देने वाली आयत
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
يَقْدُمُ قَوْمَهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فَأَوْرَدَهُمُ النَّارَ ۖ وَبِئْسَ الْوِرْدُ الْمَوْرُودُ
“वह क़यामत के दिन अपनी क़ौम के आगे-आगे होगा और उन्हें दोज़ख़ में ले जाकर उतारेगा, और वह बहुत बुरा घाट है जहाँ वे उतारे जाएँगे।”
(सूरह हूद, 11:98)
यह आयत फ़िरऔन के बारे में है। दुनिया में उसने अपनी क़ौम पर ज़ुल्म और सरकशी की और उन्हें हक़ से दूर रखा। लेकिन क़यामत के दिन भी वह उनके आगे होगा—फ़र्क़ सिर्फ़ इतना होगा कि दुनिया में वह उन्हें अपने पीछे चलाकर अपनी ताक़त बढ़ाता था और आख़िरत में वही पैरवी करने वाले उसके साथ जहन्नम की तरफ़ जा रहे होंगे।
यही इस आयत का बेहद ख़ौफ़नाक सबक़ है।
👉📖 Allah Iman walon ko kyun azmata hai? Padhen Yahan Qur'an aur Hadees ki roshani me
दुनिया का रहनुमा, आख़िरत का रहनुमा
इस आयत की रोशनी में यह बात समझ में आती है और हमारे लिए सबक़ भी है कि दुनिया में जो लोग किसी क़ौम या जमाअत के रहनुमा होते हैं, क़यामत के दिन उनके मानने वालों का अंजाम भी उनकी रहनुमाई के मुताबिक़ होगा।
अगर कोई रहनुमा लोगों को ईमान, तौहीद, नेक अमल, सच्चाई और हक़ की तरफ़ बुलाता है और लोग उसकी सही बात की पैरवी करते हैं, तो यह पैरवी उनके लिए कामयाबी का ज़रिया बन सकती है।
लेकिन अगर कोई व्यक्ति लोगों को गुमराही, बिदअत, बदअख़लाक़ी, ज़ुल्म या हक़ के ख़िलाफ़ रास्ते की तरफ़ बुलाता है और लोग बिना सोचे-समझे उसके पीछे चलते रहते हैं, तो क़यामत के दिन यही पैरवी उनके लिए वबाल बन सकती है।
इसलिए सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि “हम किसके साथ हैं?”
असल सवाल यह है:
“हम किस रास्ते पर चल रहे हैं?”
किसी की पैरवी करने से पहले सोचिए
आज के दौर में रहनुमाई सिर्फ़ किसी सियासी नेता या धार्मिक वक्ता तक महदूद नहीं रही।
सोशल मीडिया के ज़माने में कोई शख़्स एक वीडियो, एक पोस्ट या एक तक़रीर के ज़रिए लाखों लोगों की सोच को मुतास्सिर कर सकता है।
लोग किसी आलिम, वक्ता, लेखक, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर, सियासी शख़्सियत या किसी मशहूर व्यक्ति की हर बात को सही समझने लगते हैं।
लेकिन एक मुसलमान के लिए यह रवैया ख़तरनाक हो सकता है।
मशहूर होना हक़ की दलील नहीं है।
बहुत सारे लोगों का किसी के पीछे चलना भी उसके सही होने की गारंटी नहीं है।
हक़ को पहचानने का पैमाना क़ुरआन और सही सुन्नत है।
👉 इसलिए किसी की बात सुनें, उसकी अच्छी बात को अपनाएँ, लेकिन दीन के मामले में हर बात को क़ुरआन और सही अहादीस की कसौटी पर परखना ज़रूरी है।
अंधी पैरवी इंसान को कहाँ ले जा सकती है?
इंसान अक्सर यह सोचकर किसी के पीछे चल पड़ता है:
“जब इतने लोग इसके साथ हैं तो ज़रूर सही होगा।”
लेकिन क़ुरआन हमें बार-बार बताता है कि हक़ का फैसला लोगों की तादाद से नहीं होता।
कभी-कभी इंसान अपने पसंदीदा शख़्स के लिए इतनी मोहब्बत पैदा कर लेता है कि वह उसकी हर बात का बचाव करने लगता है। अगर वह सही कहे तो सही, और अगर ग़लत कहे तो भी उसे सही साबित करने की कोशिश की जाती है।
यहीं से अंधी पैरवी और गुमराही शुरू होती है।
मुसलमान का रवैया यह होना चाहिए:
“मैं किसी शख़्स को हक़ की वजह से मानूँगा, हक़ को शख़्स की वजह से नहीं।”
क़यामत के दिन गुमराह लोग अपने रहनुमाओं से क्या कहेंगे?
क़ुरआन मजीद दूसरे स्थान पर ऐसे लोगों की हालत बयान करता है जो अपने सरदारों और बड़ों की पैरवी करते रहे।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
رَبَّنَا إِنَّا أَطَعْنَا سَادَتَنَا وَكُبَرَاءَنَا فَأَضَلُّونَا السَّبِيلَا
“ऐ हमारे रब! हमने अपने सरदारों और अपने बड़े लोगों की बात मानी, तो उन्होंने हमें रास्ते से भटका दिया।(सूरह अल-अहज़ाब, 33:67)
गौर कीजिए!
दुनिया में जिन लोगों की बात मानना उन्हें आसान और अच्छा लगता था, आख़िरत में वही पैरवी उनके लिए पछतावे का सबब बन जाएगी।
लेकिन केवल रहनुमा ही ज़िम्मेदार नहीं होंगे।
पैरवी करने वाला भी ज़िम्मेदार है
यह बात समझना बहुत ज़रूरी है।
किसी गुमराह करने वाले के पीछे चलने वाला यह बहाना नहीं बना सकता कि:
“मुझे तो मेरे रहनुमा ने ऐसा बताया था।”
अगर उसके पास हक़ को जानने और समझने का मौक़ा था, फिर भी उसने आँखें बंद करके किसी व्यक्ति की पैरवी की, तो उसे अपनी ज़िम्मेदारी का जवाब देना होगा।
इसलिए इस्लाम इंसान को अक़्ल, समझ और सोचने की सलाहियत इस्तेमाल करने की दावत देता है।
आज हमें अपने रहनुमाओं की जाँच करनी चाहिए
हर मुसलमान को कभी न कभी अपने आप से यह सवाल ज़रूर करना चाहिए:
- क्या जिस व्यक्ति की मैं पैरवी कर रहा हूँ, वह मुझे अल्लाह की तरफ़ बुलाता है?
- क्या उसकी बातें क़ुरआन और सही सुन्नत के मुताबिक़ हैं?
- क्या वह तौहीद और इबादत की तरफ़ बुलाता है?
- क्या वह गुनाह से बचने और नेक अमल की दावत देता है?
- क्या वह अपनी बात को दलील से साबित करता है?
- या मैं सिर्फ़ इसलिए उसकी बात मानता हूँ क्योंकि वह मेरा पसंदीदा शख़्स है?
- अगर उसकी कोई बात क़ुरआन और सही सुन्नत के ख़िलाफ़ हो, तो क्या मैं उसे छोड़ सकता हूँ?
अगर इन सवालों का जवाब ईमानदारी से दिया जाए तो इंसान को अपनी बहुत-सी ग़लतियाँ दिखाई देने लगती हैं।
सिर्फ़ दीन के रहनुमा नहीं, सोशल मीडिया भी हमारी रहनुमाई कर रहा है
आज एक और ख़तरा है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
हम जिन लोगों को रोज़ देखते और सुनते हैं, धीरे-धीरे उनकी सोच हमारे अंदर उतरने लगती है।
हमारे मोबाइल की स्क्रीन भी एक तरह से हमारी रहनुमा बन सकती है।
जिसे हम रोज़ देखते हैं, उसकी भाषा, सोच, पसंद और नापसंद से मुतास्सिर होते जाते हैं।
अगर हमारी फ़ीड में गुनाह, बेहयाई, मज़ाक़ में दीन की बातें उड़ाना, झूठ, फ़ितना और गुमराही भरी हुई है, तो हमें सोचना चाहिए कि हम अपनी आँखों और दिल को किस रास्ते पर ले जा रहे हैं।
याद रखिए:
हर वह शख़्स जिसे हम फ़ॉलो करते हैं, हमारी ज़िंदगी में किसी न किसी हद तक असर डाल रहा है।
इसलिए सिर्फ़ यह न देखें कि “मैं किसे फ़ॉलो करता हूँ?”
यह भी देखें:
“वह मुझे कहाँ ले जा रहा है?”
अच्छे रहनुमा की पैरवी का अंजाम
जिस तरह गुमराह करने वालों के पीछे चलने का अंजाम ख़तरनाक है, उसी तरह हक़ की तरफ़ बुलाने वालों की पैरवी इंसान के लिए बहुत बड़ी नेमत है।
जो लोग लोगों को अल्लाह की इबादत, तौहीद, नमाज़, नेक अमल, सच्चाई, सब्र और आख़िरत की तैयारी की तरफ़ बुलाते हैं, उनकी दावत पर अमल करना दुनिया और आख़िरत दोनों में फ़ायदेमंद हो सकता है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
يَوْمَ نَدْعُو كُلَّ أُنَاسٍ بِإِمَامِهِمْ
“जिस दिन हम हर इंसान के गिरोह को उसके इमाम के साथ बुलाएँगे।”
(सूरह अल-इसरा, 17:71)
यह आयत भी इंसान को अपनी रहनुमाई और पैरवी के बारे में गंभीरता से सोचने पर मजबूर करती है।
अपने बच्चों की रहनुमाई पर भी ध्यान दें
यह बात सिर्फ़ अपनी ज़ात तक महदूद नहीं।
माता-पिता अपने बच्चों के रहनुमा होते हैं।
अगर घर में बच्चों को अल्लाह की पहचान, नमाज़, क़ुरआन, अदब, सच्चाई और आख़िरत की फ़िक्र सिखाई जाएगी तो इंशाअल्लाह उनके लिए यह बड़ी दौलत होगी।
लेकिन अगर बच्चों की तरबियत सिर्फ़ दुनिया की कामयाबी, पैसा, शोहरत और सोशल मीडिया के हवाले कर दी जाए, तो फिर उनकी सोच कौन बनाएगा?
जिसे हम अपने बच्चों का रहनुमा बनाएँगे, वही उनकी सोच पर असर डालेगा।
इसलिए बच्चों की तरबियत को सिर्फ़ स्कूल और मोबाइल के हवाले कर देना सही तरीका नहीं।
हमें किसके पीछे चलना चाहिए?
एक मुसलमान की सबसे बड़ी रहनुमाई क़ुरआन और रसूलुल्लाह ﷺ की सुन्नत है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ
“यक़ीनन तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल ﷺ में बेहतरीन नमूना है।”
(सूरह अल-अहज़ाब, 33:21)
इसलिए किसी इंसान की मोहब्बत हमें हक़ से ऊपर नहीं ले जानी चाहिए।
किसी आलिम का एहतराम अपनी जगह, किसी बुज़ुर्ग की मोहब्बत अपनी जगह और किसी दाई की क़द्र अपनी जगह—लेकिन हक़ सबसे ऊपर है।
आज ही अपने फ़ॉलो किए हुए लोगों की फ़ेहरिस्त देखिए
यह इस्लाही काम बहुत छोटा है, लेकिन शायद हमारी आख़िरत पर बड़ा असर डाल दे।
आज अपने मोबाइल में जाकर देखिए:
मैं किन लोगों को फ़ॉलो करता हूँ?
फिर एक-एक करके सोचिए:
- क्या इनकी बातें मुझे अल्लाह के करीब कर रही हैं या उससे दूर?
- क्या इनकी पोस्ट मेरे ईमान को बढ़ा रही हैं या गुनाह को आसान बना रही हैं?
- क्या इनके वीडियो मुझे नमाज़, क़ुरआन और आख़िरत की याद दिलाते हैं या सिर्फ़ दुनिया में उलझाए रखते हैं?
अगर कोई व्यक्ति लगातार हमें गुमराही, गुनाह या बेहयाई की तरफ़ ले जा रहा है तो उससे दूरी बनाना अपने ईमान की हिफ़ाज़त का हिस्सा है।
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सबसे बड़ा सवाल: क़यामत में हम किसके साथ होंगे?
सूरह हूद की यह आयत हमें सिर्फ़ फ़िरऔन की कहानी नहीं सुनाती।
यह हमारे लिए आईना है।
आज हम दुनिया में किसी के पीछे चल रहे हैं।
कल क़यामत के दिन भीड़ होगी।
हर इंसान अपने अंजाम की तरफ़ जा रहा होगा।
उस समय न दौलत काम आएगी, न शोहरत, न फ़ॉलोअर्स की तादाद और न यह बहाना कि:
“सब लोग तो यही कर रहे थे।”
उस दिन इंसान को अपने अमल का हिसाब देना होगा।
इसलिए आज ही फैसला कर लें कि हमारी रहनुमाई किसके हाथ में होगी।
👉 गुमराही फैलाने वालों के पीछे चलकर जहन्नम की तरफ़ जाना है या हक़ की पैरवी करके अल्लाह की रहमत और जन्नत की तरफ़ बढ़ना है?
आख़िरी इस्लाही पैग़ाम
फ़िरऔन और उसकी क़ौम का अंजाम एक ग़लत रहनुमाई की वजह से हुई। और गुमराह रहनुमाओं का अंजाम क्या है वह आप के सामने है। इस लिए गुमराह लोगों की पैरवी के बजाए अच्छे रहनुमा की पैरवी करें,क़ुरआन और सही सुन्नत की पैरवी करें इसी में कामयाबी है
सूरह हूद की आयत 98 हमें यह एहसास दिलाती है कि रहनुमाई और पैरवी कोई मामूली मामला नहीं है। जो दूसरों को गुमराही की तरफ़ बुलाता है, उसे अपनी रहनुमाई का हिसाब देना होगा। और जो बिना सोचे-समझे गुमराह व्यक्ति के पीछे चलता है, उसे भी अपनी पैरवी का जवाब देना होगा।
इसलिए:
- किसी शख़्स को नहीं, हक़ को अपना पैमाना बनाइए।
- किसी भीड़ को नहीं, क़ुरआन और सही सुन्नत को अपना रहनुमा बनाइए।
- किसी की मशहूरी को नहीं, उसकी दावत की सच्चाई को देखिए।
और सबसे बढ़कर—
अपने आज को ऐसा बना लीजिए कि क़यामत के दिन अपने रहनुमा के साथ खड़े होने में शर्मिंदगी नहीं, बल्कि कामयाबी और सुकून महसूस हो।
एक बार फिर अपने आप से पूछिए:
“मैं आज जिस रास्ते पर चल रहा हूँ, अगर यही रास्ता मुझे क़यामत के दिन भी उसी जगह ले जाए तो क्या मैं उस अंजाम के लिए तैयार हूँ?”
अगर जवाब “नहीं” है, तो रास्ता बदलने का सबसे अच्छा वक़्त आज है।
🤲 अल्लाह तआला हमें हक़ को हक़ समझकर उसकी पैरवी करने, बातिल को बातिल समझकर उससे बचने और क़यामत के दिन नेक लोगों की रहनुमाई में जन्नत की तरफ़ जाने वालों में शामिल फ़रमाए। आमीन।
FAQs – क़यामत के दिन रहनुमा और पैरवी का अंजाम
1. सूरह हूद आयत 98 में किसका ज़िक्र किया गया है?
सूरह हूद की आयत 98 में फ़िरऔन का ज़िक्र है। बताया गया है कि क़यामत के दिन वह अपनी क़ौम के आगे-आगे होगा और उन्हें जहन्नम की तरफ़ ले जाएगा। इससे गुमराह रहनुमाई के ख़तरनाक अंजाम का पता चलता है।
2. क़यामत के दिन गुमराह रहनुमाओं का क्या अंजाम होगा?
जो लोग दुनिया में लोगों को गुमराही, बातिल या हक़ के ख़िलाफ़ रास्ते की तरफ़ बुलाते हैं, उनके लिए आख़िरत में सख़्त अंजाम है। सूरह हूद 11:98 में फ़िरऔन और उसकी क़ौम का यही ख़ौफ़नाक मंज़र बयान हुआ है।
3. क्या किसी गुमराह व्यक्ति की पैरवी करने वाला भी ज़िम्मेदार होगा?
हाँ। इंसान को अपनी पैरवी और अपने अमल का भी जवाब देना होगा। केवल यह कहना कि “मैं तो अपने रहनुमा के पीछे चल रहा था” आख़िरत में ज़िम्मेदारी से बचने के लिए काफ़ी नहीं होगा।
4. क़ुरआन में गुमराह रहनुमाओं की पैरवी के बारे में क्या बताया गया है?
सूरह अल-अहज़ाब 33:67 में ऐसे लोगों का बयान है जो क़यामत के दिन कहेंगे कि हमने अपने सरदारों और बड़े लोगों की बात मानी और उन्होंने हमें रास्ते से भटका दिया।
5. क्या हर मशहूर व्यक्ति की बात मानना सही है?
नहीं। किसी व्यक्ति की मशहूरी उसके सही होने की दलील नहीं है। दीन के मामले में बात को क़ुरआन और सही सुन्नत की रोशनी में देखना चाहिए।
6. मुसलमान को किसकी पैरवी करनी चाहिए?
मुसलमान को अल्लाह की किताब और रसूलुल्लाह ﷺ की सही सुन्नत की पैरवी करनी चाहिए। किसी व्यक्ति की बात अगर क़ुरआन और सही सुन्नत के मुताबिक़ हो तो उसे स्वीकार किया जा सकता है, लेकिन किसी इंसान को हक़ से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
7. क्या सोशल मीडिया के लोगों की पैरवी भी हमारे अंजाम पर असर डाल सकती है?
अगर कोई व्यक्ति लगातार ऐसी सोच या सामग्री की तरफ़ ले जाता है जो गुनाह, बेहयाई या गुमराही को बढ़ाती है, तो उसकी पैरवी इंसान के ईमान और अमल पर बुरा असर डाल सकती है। इसलिए हमें यह देखना चाहिए कि हम किसे फ़ॉलो कर रहे हैं और वह हमें किस रास्ते पर ले जा रहा है।
8. अच्छे रहनुमा की पैरवी का क्या फ़ायदा है?
जो रहनुमा लोगों को ईमान, तौहीद, नेक अमल और अल्लाह की फ़रमाँबरदारी की तरफ़ बुलाते हैं, उनकी सही दावत पर अमल करना इंसान के लिए दुनिया और आख़िरत में फ़ायदेमंद हो सकता है।
9. सूरह हूद आयत 98 से हमें क्या इस्लाही सबक़ मिलता है?
इस आयत से यह सबक़ मिलता है कि हमें किसी की अंधी पैरवी नहीं करनी चाहिए। हमें अपने रहनुमाओं और अपनी पैरवी दोनों का जायज़ा लेना चाहिए और यह देखना चाहिए कि हमारा रास्ता क़ुरआन और सही सुन्नत के मुताबिक़ है या नहीं।
10. क़यामत के दिन किसके साथ होना सबसे बड़ी कामयाबी है?
सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि इंसान ईमान और नेक अमल के साथ अल्लाह के नेक बंदों में शामिल हो और आख़िरत में अल्लाह की रहमत से जन्नत हासिल करे। इसलिए दुनिया में ही अपने रास्ते और अपनी पैरवी को सही करना ज़रूरी है।

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